Smaj – Ek vidambna

– बेटी लड़को के साथ नहीं खेलते वो गंदे होते है न। वो मार-पीट वाले खेल खेलते है आपको चोट लग जाएगी।

– सुनो बिना वजह लड़को से बात नहीं किया करो,पढ़ने-लिखने पर धयान दो। उन्हें तो बस आवारागर्दी करनी होती है बेटा।

-लड़को से दोस्ती ठीक नहीं है। उनके साथ घूमना-फिडना छोड़ दो। मुहल्ले में बिना वजह बदनामी होगी।

जी हाँ.!! ये तो महज़ चंद नमूने पेश किये है। ये वो नसीहत है जो अलग-अलग उम्र में माँ-बाप अपनी बेटियों को देना अपना कर्त्वय समझते है। देना भी चाहिए,आज कोई कहीं भी सुरक्षित नहीं है। देखा जाये तो समाज नैतिक पतन की ओर बढ़ रहा है इस हाल में अपने बच्चे की सुरक्षा को लेकर चिंतित होना बिलकुल जायज है। बरहाल वो सुरक्षा का विषय थोड़ा अलग है और मैं जो कहने जा रही वो कुछ और है।

हाँ तो,बचपन से लेकर टीनएज और टीनएज से जवानी के दहलीज़ पर कदम रखने तक हम लड़कियों के सामने लड़के को दुशाशन या रावन के जैसे चित्रित करते है। जो उनका दोस्त या शुभचिंतक कभी भी नहीं हो सकता। उनसे निश्चित दुरी में रह कर ही इज़्ज़त बनी रह सकती है। उनका किसी भी प्रकार से छूना पाप है।

और पता नहीं क्या-क्या।
खैर.! जो भी ज्ञान की घुटी माँ-बाप या समाज ने पिलाई सब जायज है अपनी जगह पर।

अब मेरा सवाल है की, अचानक एक दिन चार मन्त्र पढ़ कर, गले में काले मोती की माला और लाल रंग बालों में डाल देने भर से उसे लड़की के आत्मा से लेकर शरीर पर हक़ कैसे मिल जाता है। कैसे उसे बंद कमरे में एक अजनबी के साथ आप छोड़ देते हो वो सबकुछ करवाने के लिए जिसके लिए ताउम्र आपने उसे मना किया।

चलिए आप कहेंगे युगों-युगों से यही तो होता आया है, तो आज के लड़की साथ हो रहा तो क्या जुल्म हो गया। जी, तो जुल्म तब तक नहीं होता जब तक, लड़की को शिकायत नहीं होती। आपसी सहमति से संबंध बने। जुल्म वहां से शुरू हो जाता है, जब वो अजनबी जो अब ‘पति-परमेश्वर’ है, अपने सनातन अधिकार स्वरूप ज़बरदस्ती करना आपका हक़ समझते हैं।

और हाँ बिना लड़की के मर्ज़ी के साथ उसके साथ कुछ भी करना “बलात्कार”ही है। चाहे आदरणीया “मेनका गांधी” या कोई और महानुभाव कुछ भी वक्तव्य दे।

मुझे पूछना है किसी एक से नहीं, इस समाज में तमाम वैसी सोच रखने वाले माँ-बाप से,क्या आपने कभी भी खुल कर अपनी बेटी से पीरियड्स, अपने से विपरीत सेक्स के प्रति होने वाले आकर्षण के बारे में ज़िक्र भी किया है। कभी पास बिठा कर उससे सेक्स क्या होता है, उसके बारे में बात किया है। शादी से पहले उसे बताया है की अचानक से उसके साथ क्या होगा। कभी मानसिक रूप पर उसे तैयार करने की कोशिश की है।

यही दिक्क्त है हमारे समाज की,हम सिर्फ सतही बात करते है। उन बातो का ज़िक्र भी नहीं करते जिनसे ज़िंदगी का भला हो, आपकी अपनी बेटी का भला हो। आखिर कब तक यूँ ही पुरानी रूढ़ियों में हम जकड़े रहेंगे। कब हम खुले बाहों से उन्मुक्त विचारों का स्वागत करेंगे।

शायद कभी भी नहीं क्योंकि हमारी बेटियों की खुशियों के अपेक्षा,हमारे लिए आज भी रीति-रिवाज़, समाजिक-प्रतिष्ठा का अधिक महत्वपूर्ण है!

#saurabhyadavceo

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