मुलाक़ात!

आँखों में चाँदनी रात जैसे हल्के काजल, होंठ पर लाल शाम जैसी लाली, गाल गुलाबी सर्दी से और अंधेरे में लालटेन जैसा चमकता उसकी माँग में चटक नारंगी सिंधूर! प्रवीन ने कभी सोचा नही था के निहारिका को दस साल बाद यूँ अचानक देखेगा! वो सिंपल सी सलवार सूट में रहनी वाली सादी सी लड़की आज एक ज़िम्मेदार और सशक्त माँ, बहु और पत्नी दिख रही थी! हाँ दस साल हो चुके थे निहारिका की शादी को! साथ में एक सात साल का लड़का था जिसका गाल बिलकुल निहारिका के गाल की तरह गोल मटोल था! जगह आज भी वही नाका के पास हनुमान मंदिर ही थी जहाँ वो मंगलवार की शाम को छुप छुप के १०-१५ मिनट के लिए दुनिया से नज़रें बचा के मिला करते थे! 

 

अरसे बाद मिलन हुआ तो हिचकिचाहट भी लाज़मी थी! नज़रें मिलते ही जैसे पुराने सभी दृश्य किसी फ़िल्म की तरह एक सेकंड में छा गए! धड़कनें कुछ पल के लिए ऐसे तेज़ हो गयीं हो जैसे पहले मैच में बॉल फेंकना हो और सामने सचिन हों! मंदिर की दीवार भी वही थी, घंटियाँ भी, पुजारी भी, भगवान भी और वही निहारिका वही प्रवीन! लेकिन समय अब वो न था! नज़रिया भी और रिश्ता भी! धड़कने सामान्य होने लगी और याद आया के सचिन भी अब रिटायर ही हो चुके हैं! बात की शुरुआत निहारिका ने की और पूछा..

 

“अरे प्रवीन आप! आज भी आप इसी मंदिर में आते हो?”

“हाँ जब इस(तुम्हारे) शहर में आतें हैं तो मंगलवार को ज़रूर यहाँ आते हैं! तुमसे यहाँ मिलना पहले इत्तफ़ाक़ हुआ करता था फिर प्लान और देखो आज फिर इत्तफ़ाक़”

“हाहाहाहा! और भाभी जी कहाँ हैं? पोस्टिंग कहा हैं? माँ-पापा कैसे हैं? और तुमतो(झट से आप से तुम! ये भी कला ही है) काफ़ी गोरे भी हो गए!”

“पोस्टिंग दिल्ली में हैं! माँ ठीक है और पापा भी रिटायर होने वाले हैं जून में! और बहुत दिनों बाद देख रही तो गोरे भी लग रहे!”

“अब तुम्हारी वो बड़ी बड़ी दाढ़ी क्यूँ नही है?”

“मम्मी चिल्लाती रहती हैं यार और उसको मेंटेन रखना भी नही हो पाता! ऑफ़िस में सही नही लगता यूँ जंगली हो कर जाना!”

“चलो शुक्र है तुमको एहसास तो हुआ के जंगली लगते थे दाढ़ी में!”

“Hahaha हाँ वो दौर अलग था!”

“अच्छा फ़ैमिली कहाँ हैं तुम्हारी! तुम्हारे हिसाब से तो तुमको हर साल एक बच्चा चाहिए था! बच्चों की फ़ौज खड़ी करनी थी न तुमको तो!”

“अरे वो ख़्वाब तो किसी एक के साथ ही देखा था! अब कहानी बदल गयी है!”

“अच्छा तो तुमको भी नायिका बदलनी चाहिए थी कहानी नही!”

“बातें बनाना सीख गयी हो तुम!”

“तुम्हारे साथ ५ साल रहे हैं! तुमको इतना सुने हैं के इतना बोलना तो सीख ही लिया!, बताओ न कहाँ है सब?”

“नही यार शादी नही की अभी तक! अब सोच रहें कर लें! माँ पापा भी बहुत प्रेशर बनाए हुए हैं! शादी के बाद अगर मेरी बेटी हुई तो उसका नाम निहारिका रखेंगे!”

“Hahaha बातें आज तक वैसी ही हैं तुम्हारी! शादी कर लो जल्दी! हमने सोचा था के अब तक तुम्हारी फ़ौज तैयार हो चुकी होगी! चलो चलतें हैं अब”

“हाँ चलो!” (प्रवीन ने बच्चे को गोद में उठाया और बाहर की तरफ़ चलते हुए बच्चे से पूछा!)

“बाबू! नाम क्या है आपका?”

“प्लवीन(प्रवीन)” (लड़के ने तुतलाते हुए जवाब दिया!)

‘प्रवीन ने निहारिका की तरफ़ देखा पर कुछ बोल न सका’

 

हिंदुस्तान में ऐसी कई कहानियाँ रोज़ ही गली गली नुक्कड़ पर पैठ कर चाय सुट्टा पीती हुई पनपती रहतीं हैं! दुनिया बहुत छोटी है और गोल भी! कब किसको कहाँ कौन कैसे मिल जाए कुछ कहना सम्भव नही है! लौंडों की ज़िंदगी में गिने चुने रंग(सफ़ेद काला लाल पिला नीला हरा) ही होते हैं! वो तो उनके आने के बाद मैचिंग कलर और सतरंगी रंगों के चोचलों का ज्ञान होता है! साथ में ही कई सपने बुने जाते हैं उन्ही रंगो से! उन्ही के रंगो से!

 

ख़ैर! उस शाम प्रवीन ने एक रिक्शा रोका और आदतन रिक्शे वाले को किराया देकर निहारिका को विदा कर दिया! आज पहली बार प्रवीन निहारिका के जाने के बाद मुस्कुरा रहा था! आज पहली बार निहारिका को प्रवीन से दूर होने पर बेचैनी नही हो रही थी! आज पहली बार उस छोटे से प्रवीन ने ख़ुद के अलावा किसी और प्रवीन को देखा! चक्का घूमता रहता है कहानियाँ बनती रहती हैं पर कभी कभी किरदार बदल जाएँ तो कहानियाँ क़िस्सों में बँट के ख़त्म हो जाती हैं! प्रवीन ने भी अपनी मोटरसाइकिल स्टार्ट की! साइड मिरर में देख के मुस्कुराया और उनकी पसंदीदा लाइन गुनगुनाते हुए आगे बढ़ गया!

 

“ओ मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने बुने, सपने सुरीले सपने!” 🎈

 

#saurabhyadavbjp

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