Dedicated to my mother…

ए मम्मी!

कभी कभी जब बचपन की पुरानी फोटू देखता हूँ न तो एक मुस्कान खुद ब खुद खिल उठती है। वो वाली फोटू जिसमें मैं दांत चिहारे आपके बगल बैठा हूँ और पापा फोटू खींच रहे हैं। वो फोटू भी जिसमें मैं पहली बार टाई बेल्ट लगा के स्कूल जाने को तैयार हूँ और आपका पल्लू पकड़ के खड़ा हूँ वो भी और वो पहले जन्मदिन वाली फोटू भी जिसमें मैं आपकी गोद में हूँ और लोग केक खिला खिला के मेरा नरक किये जा रहें हैं। हर एक फोटू एक दौर याद दिला देती है।

मुझे अभी भी याद है जब बचपन मैं पापा के साथ क्रिकेट बैट खरीदने जाता था तो आप पापा को सहेज देती थी के “सचिन वाला ही लेना” सचिन के लिए मेरी वो बौड़म दीवानगी को सिर्फ आपही ने समझा है। जब स्कूल जाते वक़्त मैं आपसे रोज़ 2 रुपये मांगता था और आप मना कर देती थी तो मैं यही सोचता था के कितनी कंजूस हो आप, पागल था मैं ये भूल ही जाता था के वो 4 रुपये वाला पारलेजी उस 2 रुपये से 2 रूपये महंगा था। आपसे रोज़ 1 रूपये लेकर ‘चाचा चौधरी’ कॉमिक्स किराये पे लाना और आपसे पढ़वा के ठहाके लगा के हँसना आज भी बहुत मिस करता हूँ। शहर से दूर जब पहली बार बाहर पढाई करने गया था तो हर रोज़ आपके बनाये खाने को मिस करता था.. हर रोज़.. और यही बोलता था के “यार थोड़ा और नमक होता तो बिलकुल मम्मी वाली सब्जी बनती!”

स्कूल में वो चोट्टी मैडम मेरी शिकायत करती तो आप खुद सब सुन लेती पर घर पे कभी मेरे गाल पे अपना गुस्सा नहीं उतारती थी।हालांकि मेरे नंबर कम आने पे बार बार उस शर्मा जी के लौण्डे वाला ओरहन आज तक सुन्ना पड़ता है मुझे पर अब तो सुनने की आदत भी पड़ गयी है।

मुझे स्कूल के लिए जूता-मोजा, टाई-बेल्ट और वो किनारे से मांग काढ़ के स्कूल भेजना और लौटते वक़्त वो ऑरेन्ज वाली आइसक्रीम खरीदना जिसे खा के पान खाने वाली फीलिंग आती है उसका स्वाद अभी तक जुबां पर है मेरे। आज भी जब देर तक सोता हूँ तो आप उसी टोन में चिल्लाकर बोलती हो के “10 बज रहा है और अभी तक सो रहे हो!!(भले ही घडी में 8 बज रहा हो!) ” महीनों बाद आज भी जब घर वापस आता हूँ तो स्पेशल भोजन(मिडिल क्लास शाकाहारी फैमिली में पनीर की सब्जी को स्पेशल बोलते हैं।) ही बना मिलता है।

बचपन में आपका वो तवे पे मेरे लिए छोटी छोटी रोटियां बनाना और दाल चावल सान के चम्मच लगा में खिलाना हमेशा अनमोल रहेगा। आज भी उन रोटियों में बचपन ढूंढता हूँ मैं! “आग लगे तुम्हारे फोन को” और “फोन में क्या देख देख मुस्किया रहे हो?” मेरे फोन को लेके बोलने वाला आपका फेवरेट डाइलॉग है। मुझे मालूम है आप बहुत इर्रिटेट होजाती हो मेरा ये फोन देख के।

लिखने को तो इतना कुछ है के हर एक लाइन पे दस कहानी याद आरही है।पर क्या करूँ कलम जाम सी हो गयी है। आपका “तारे जमीं पे” फ़िल्म का “मेरी माँ” वाला गाना सुन के रो देना और फिर फोन करके मेरा हाल पूछना मुझे भी रुला ही देता है। यार मम्मी कहने को तो बहुत कुछ है पर कह नही पा रहे। वैसे भी आप तो सब जानती हो न! और हाँ बहु ढूंढ ली है मैंने आपके लिए!;-) परेशान मत हो आप!

आपका नालायक लड़का…

 

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Jindagi ek lachari

Number of people who are attending Bieber concert is 45,000 as per Mumbai police. The average cost of tickets which ranges from 4k to 76k comes up to 15,000 per person (conservative estimate). Multiply it by the number of people who are attending the concert and you will get an amount more than 70,00,00,000 including money that you will spend on booze and food.

 

1 in 3 farmers commit suicide per day in Vidarbha region of Maharashtra because of crop failure resulting in their inability to repay loans. The average amount of loan outstanding for which they take their own lives is a merely Rs.10,000. Two different stark realities.

 

I am not saying do not go for the concert or stop playing cricket matches or stop watching movies till we sort out other issues. I am just trying to put things in perspective with these facts which tells us frankly that India isn’t a poor or undeveloped country. We have money, loads of it but sadly somewhere we seem to have lost our priorities. I am not saying save 15,000 on the concert and donate it to the needy, after all everyone has a right to enjoy themselves with their own money, but what I am saying is, that 15,000 could have saved someone’s life and family today. It’s all about income inequality in the end and our country seems to have a lot of it.

 

#saurabhyadavbjp

मुलाक़ात!

आँखों में चाँदनी रात जैसे हल्के काजल, होंठ पर लाल शाम जैसी लाली, गाल गुलाबी सर्दी से और अंधेरे में लालटेन जैसा चमकता उसकी माँग में चटक नारंगी सिंधूर! प्रवीन ने कभी सोचा नही था के निहारिका को दस साल बाद यूँ अचानक देखेगा! वो सिंपल सी सलवार सूट में रहनी वाली सादी सी लड़की आज एक ज़िम्मेदार और सशक्त माँ, बहु और पत्नी दिख रही थी! हाँ दस साल हो चुके थे निहारिका की शादी को! साथ में एक सात साल का लड़का था जिसका गाल बिलकुल निहारिका के गाल की तरह गोल मटोल था! जगह आज भी वही नाका के पास हनुमान मंदिर ही थी जहाँ वो मंगलवार की शाम को छुप छुप के १०-१५ मिनट के लिए दुनिया से नज़रें बचा के मिला करते थे! 

 

अरसे बाद मिलन हुआ तो हिचकिचाहट भी लाज़मी थी! नज़रें मिलते ही जैसे पुराने सभी दृश्य किसी फ़िल्म की तरह एक सेकंड में छा गए! धड़कनें कुछ पल के लिए ऐसे तेज़ हो गयीं हो जैसे पहले मैच में बॉल फेंकना हो और सामने सचिन हों! मंदिर की दीवार भी वही थी, घंटियाँ भी, पुजारी भी, भगवान भी और वही निहारिका वही प्रवीन! लेकिन समय अब वो न था! नज़रिया भी और रिश्ता भी! धड़कने सामान्य होने लगी और याद आया के सचिन भी अब रिटायर ही हो चुके हैं! बात की शुरुआत निहारिका ने की और पूछा..

 

“अरे प्रवीन आप! आज भी आप इसी मंदिर में आते हो?”

“हाँ जब इस(तुम्हारे) शहर में आतें हैं तो मंगलवार को ज़रूर यहाँ आते हैं! तुमसे यहाँ मिलना पहले इत्तफ़ाक़ हुआ करता था फिर प्लान और देखो आज फिर इत्तफ़ाक़”

“हाहाहाहा! और भाभी जी कहाँ हैं? पोस्टिंग कहा हैं? माँ-पापा कैसे हैं? और तुमतो(झट से आप से तुम! ये भी कला ही है) काफ़ी गोरे भी हो गए!”

“पोस्टिंग दिल्ली में हैं! माँ ठीक है और पापा भी रिटायर होने वाले हैं जून में! और बहुत दिनों बाद देख रही तो गोरे भी लग रहे!”

“अब तुम्हारी वो बड़ी बड़ी दाढ़ी क्यूँ नही है?”

“मम्मी चिल्लाती रहती हैं यार और उसको मेंटेन रखना भी नही हो पाता! ऑफ़िस में सही नही लगता यूँ जंगली हो कर जाना!”

“चलो शुक्र है तुमको एहसास तो हुआ के जंगली लगते थे दाढ़ी में!”

“Hahaha हाँ वो दौर अलग था!”

“अच्छा फ़ैमिली कहाँ हैं तुम्हारी! तुम्हारे हिसाब से तो तुमको हर साल एक बच्चा चाहिए था! बच्चों की फ़ौज खड़ी करनी थी न तुमको तो!”

“अरे वो ख़्वाब तो किसी एक के साथ ही देखा था! अब कहानी बदल गयी है!”

“अच्छा तो तुमको भी नायिका बदलनी चाहिए थी कहानी नही!”

“बातें बनाना सीख गयी हो तुम!”

“तुम्हारे साथ ५ साल रहे हैं! तुमको इतना सुने हैं के इतना बोलना तो सीख ही लिया!, बताओ न कहाँ है सब?”

“नही यार शादी नही की अभी तक! अब सोच रहें कर लें! माँ पापा भी बहुत प्रेशर बनाए हुए हैं! शादी के बाद अगर मेरी बेटी हुई तो उसका नाम निहारिका रखेंगे!”

“Hahaha बातें आज तक वैसी ही हैं तुम्हारी! शादी कर लो जल्दी! हमने सोचा था के अब तक तुम्हारी फ़ौज तैयार हो चुकी होगी! चलो चलतें हैं अब”

“हाँ चलो!” (प्रवीन ने बच्चे को गोद में उठाया और बाहर की तरफ़ चलते हुए बच्चे से पूछा!)

“बाबू! नाम क्या है आपका?”

“प्लवीन(प्रवीन)” (लड़के ने तुतलाते हुए जवाब दिया!)

‘प्रवीन ने निहारिका की तरफ़ देखा पर कुछ बोल न सका’

 

हिंदुस्तान में ऐसी कई कहानियाँ रोज़ ही गली गली नुक्कड़ पर पैठ कर चाय सुट्टा पीती हुई पनपती रहतीं हैं! दुनिया बहुत छोटी है और गोल भी! कब किसको कहाँ कौन कैसे मिल जाए कुछ कहना सम्भव नही है! लौंडों की ज़िंदगी में गिने चुने रंग(सफ़ेद काला लाल पिला नीला हरा) ही होते हैं! वो तो उनके आने के बाद मैचिंग कलर और सतरंगी रंगों के चोचलों का ज्ञान होता है! साथ में ही कई सपने बुने जाते हैं उन्ही रंगो से! उन्ही के रंगो से!

 

ख़ैर! उस शाम प्रवीन ने एक रिक्शा रोका और आदतन रिक्शे वाले को किराया देकर निहारिका को विदा कर दिया! आज पहली बार प्रवीन निहारिका के जाने के बाद मुस्कुरा रहा था! आज पहली बार निहारिका को प्रवीन से दूर होने पर बेचैनी नही हो रही थी! आज पहली बार उस छोटे से प्रवीन ने ख़ुद के अलावा किसी और प्रवीन को देखा! चक्का घूमता रहता है कहानियाँ बनती रहती हैं पर कभी कभी किरदार बदल जाएँ तो कहानियाँ क़िस्सों में बँट के ख़त्म हो जाती हैं! प्रवीन ने भी अपनी मोटरसाइकिल स्टार्ट की! साइड मिरर में देख के मुस्कुराया और उनकी पसंदीदा लाइन गुनगुनाते हुए आगे बढ़ गया!

 

“ओ मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने बुने, सपने सुरीले सपने!” 🎈

 

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Evening diary…

अक्सर जब कहीं मन नही लगता तो पार्क में आकर बैठ जाता हूँ! सुकून सा मिलता है! अक्सर भीड़ सी रहती हैं यहाँ! रोज़ कुछ न कुछ नया देखने को मिलता है! हर रोज़ नए चेहरे, नयी तरह से फ़ोटो खींचते लोग और अलग अन्दाज़ में पोज देते युगल! ५०-५५ साल के अंकल आंटी ईव्निंग वाक पे निकले हैं! कुछ बुज़ुर्ग दादा-दादी योगा करने नाकाम कोशिश कर रहे!

सबके चेहरे पे एक अलग सा इक्स्प्रेशन है! कोई पहली बार आया है अपनी मोहतरमा के साथ तो कोई आज आख़िरी मुलाक़ात मुकम्मल कर रहा है! कोई उँगलियों का टाँका बना फँसा के आहिस्ता-आहिस्ता चल रहा तो कोई हाथ पकड़ के भागता हुआ! कोई ऑफ़िस ख़त्म करके आया है तो कोई अपने स्कूल कॉलेज बंक करके! एक छोटा सा बच्चा भी है जो एक ग़ुब्बारे वाले को देख रहा तो एक बार अपनी अम्मा को! और धीरे धीरे टनकता हुआ ग़ुब्बारे वाले के पास पहुँच गया! इस उमर में ग़ुब्बारे का मोह अम्माँ-बाबू के मोह से ज़्यादा होता है! एक छोटी सी बच्ची है जो फ़व्वारे के सामने लगी रेलिंग को पकड़ के लटक रही है! फ़ौव्वारे की छीटें उसके चेहरे पे पड़ रही है और वो खिलखिला के हंस रही है! शायद इसे ही कहते हैं ओरिज़िनल हसीं!

कई(ज़्यादातर) जोड़ें हैं! कुछ इधर उधर ताक के झट से उनके गालों को झटके से चूम ले रहें हैं और कुछ सुकून में चूमने के लिए कोना ढूँढ रहे हैं! लड़कों का कुछ झुंड प्रेमी युगल के आस-पास ही मँडरा रहा है, शायद कोई लीला देखने को मिल जाए! पार्क में एक हवाई जहाज़ रखी हुई है! शौक़िया लड़के-लड़कियाँ उसके उसके इर्द-गिर्द पोज(जैसे ताजमहल के गुम्बद को पकड़ने वाला) दे रहें हैं! गुटका खाने वाले लौंडे पीक मारने के लिए कोना ढूँढ रहे हैं!

लड़कियाँ सेल्फ़ी ले रहीं है! लड़के चुपके चुपके सेल्फ़ी लेती लड़कियों की फ़ोटो खींच रहे हैं! गॉर्ड सीटी बजा के एलर्ट कर रहा है के हम आरहें हैं कुछ देर के लिए चूमना-चिपकना बंद कर दो! डूड लौंडे अंधेरे में भी नक़ली रे-बैन लगा के पार्क में लेट-बैठ के फ़ोटू खिंचा रहा उनका गबरू डूड दोस्त उनको इस कृत्य के लिए प्रोत्साहित कर रहें!

और हम साले को अकेले बैठ के लिख रहे हैं, ओबसर्वेशन कर रहें हैं! किसी को मिस कर रहें हैं! किसी को याद हैं! सोच रहें के कहीं ,,,,दिख जाए शायद! वो भी घूमता रहता है “अक्सर!

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confusion…..

कभी कभी सोचते हैं ख़ूब शराब पी के लिखें! न जाने क्या लिखेंगे! चाँदनी रातें या जलता हुआ सूरज! ठण्डी बयार या लूह की गरम हवाएँ! नही पता! अपने प्रेम की वो बिंदी काजल जो उन्होंने लगाना छोड़ दिया है या उनका हेयर कट! पता नही! हमारे दिल की वो बातें जो उनसे ठीक से कह भी नही पाते या वो कनफ़्यूसन जो वो कभी दूर नही कर सकते! पिता जी के अरमान या माता जी की उम्मीदें? छोटी बहन की ख़्वाहिशें या छोटे भाई के शौक़?

कभी कभी शराब को होंठो से लगा के लिखें उस दोस्त का दर्द जो गुज़र रहा उस दौर से जो गुज़रता ही नही या उस लड़की की ख़याल जो सब कुछ हार चुकी है मेरे ऊपर ये जानते हुए भी कि हम किसी जनम में उसके थे ही नही!

हमें इस मतलबी दुनिया में अपने मतलब की चीज़ें मिल ही जाती हैं! जैसे किसी पुरानी फ़िल्म के वो जेन्यून गाने जिन्हें अक्सर हम बेवजह गुनगुनाते रहते हैं! लिखने का मन तो होता है पर उँगलियाँ और दिमाग़ का बैलेंस बन नही पाता! कई दफ़ा लाखों ख़याल इधर ऐ उधर घूम जाते हैं और उनको लिखने को एक शब्द नही निकल पाते!

कभी कभी मन होता है कि अनवरत पीते रहें सिगरेट उनके लाख मना करने पर भी! वो टोकते हैं और हम चुपके से पी के बुझा दें और वो मुँह फुला के बैठ जाएँ! फुलिया का फूला मुँह अच्छा लगता है! उस फूले मुँह में चिंता दिखती है असली वाली!

कभी कभी जी चाहता है कि ख़त्म कर दें उन रिश्तों को जो ज़बरजसती के वादों पे चल रहे हैं! जिनके नाम तो है कई चिट्ठियाँ और कई ख़्वाब परघुट के रह गए किसी के ईगो की आग के धुवें में और राख हो गए सारे जज़्बात!

कभी कभी मन होता है लिखे उन लोगों को जो जानते हैं हमको हमसे बेहतर बल्कि वो कभी हमसे मिले ही नहीं! बना ली है एक राय उन्होंने और संक्रमित हो रहें हैं ख़ुद के पर्सिप्शन में! दिमाग़ी रूप से दिवालिया लोग! जो करते हैं हमारे पीछे हमारे चर्चे और सुनाते हैं हमारे ऐसे ऐसे किससे जो हमने ख़ुद कभी सुने ही नही!

कभी कभी जी चाहता है के हसें बेतहाशा ख़ुद के ऊपर क्यूँकि हमें पता होता है कि हर बार हम बेवक़ूफ़ थे! लिए गए सारे पुराने फ़ैसले कितने खोखले थे!

कभी कभी सोचते हैं ख़ूब शराब पी के लिखें! कभी पिए तो लिखेंगे! ज़रूर लिखेंगे!

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ek ansuljhi paheli

यही फेसबुक वाइबर का दौर था.. उन दोनों की बाते अजनबीयों की तरह ही शुरू हुई थी। लड़का थोड़ा आवारा किस्म का था, थोड़ा झूठा सा! और वो समाज को झेलती हुई, समाज के खोखले दीवार के बीच फंसी हुई.. अपने खुद के बनाये गए दायरे में बंधी हुई बहादुर लड़की।

अक्सर एकदम विपरीत किस्म के लोग ही एक दूसरे से अट्रैक्ट होते हैं। वो दोनों एक दूसरे से एकदम विपरीत थे.. वो लापरवाह था तो वो अपने टाइम की पंक्चुवल | वो भुलक्कड़ था तो वो चलती फिरती घड़ी। पर कुछ तो थ नहीं तो कौन भला किसी से बात करने के लिए msg pack करवाता है। कौन लड़की एक अजनबी के लिए टीशर्ट खरीदने की कवायत करती है? कुछ तो था ही।

लड़के की ज़िन्दगी इतनी उलझी और फैली हुई थी के लड़की उसपे विश्वास करने से घबराती थी। लड़के ने भी अपनी मुट्ठी खोल दी थी। कोई सफाई नही। न ही कोई बहाना.. जो कुछ भी था सब सामने था। लड़के की सारी थेओरी अब फेल होती जा रही थी। खुद के डाइलॉग अब खुद पे लागू नही हो रहे थे। पर करता भी तो क्या वो बला थी ही कुछ ऐसी! दबंग अंदाज़, मुहफट्ट बोल, और बेबाक झलकता सच। इतना काफी होता है किसी के होश उड़ाने को।

कई कहानियों का अंत बहुत जल्दी हो जाता है। क्या पता इसका भी हो जाये। पर इत्ते कम समय में किसी खुले परिंदे को कलम उठाने पे मजबूर कर देना ये भी किसी मिरेकल से कम नही। आगे क्या होगा किसे फिकर है पर जो भी था बेहद खूबसूरत था।

पता है अजनबी होने में सबसे अच्छा क्या होता है..? आप गिले शिकवे नही कर सकते.. उम्मीदें नही कर सकते.. पर उम्मीदें बन्ध जाती हैं। वो क्या है न के दिल उम्र देख के नही धड़कता.. पर उनकी आवाज़ पे धड़कना तेज़ जरूर कर देता है।

झूठ से रिश्ते की शुरुवात करने से अच्छा होता है सच से बादल को साफ़ कर देना। अंत जो भी हो.. मंज़िल मिले न मिले पर हाँ इन रास्तों से इश्क़ हो गया है। और।जब रास्तों से इश्क़ हो जाये तो मंज़िल की चिंता किसे रहती है?

वो गाना है न.. मुझे बहुत पसन्द है…
“वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन,
उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा!!!
चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों…”

to be continued…………..

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Railways working to ensure confirmed berths on demand by 2021: Suresh Prabhu

To bridge the demand-supply gap, the railways is planning to introduce more passenger trains on high-density routes. Come 2021 and a passenger could be assured of a confirmed berth on his preferred train, if the railways plan to augment capacity on busy routes materialises.
At present, there is a huge gap between the demand and the availability of train berths, particularly on the busy Delhi-Howrah and Delhi-Mumbai routes.
It leaves many passengers with wait-listed tickets, which means if the ticket does not get confirmed, the passenger is not allowed to travel.
Railway Minister Suresh Prabhu said, “This could be made possible once goods trains are shifted to dedicated freight corridors, the work on which is going on in full steam, and infrastructure on the busy Delhi-Howrah and Delhi-Mumbai routes is upgraded to speed up trains.”
“Lines are oversaturated now. With the commissioning of DFCs, there will be more scope for running passenger trains at a higher speed,” he said at an event organised by the industry body CII.
The 3,228km-long eastern- and western-dedicated freight corridors are expected to be operational by December 2019. Besides, the railways has started the work on Delhi-Howrah and Delhi-Mumbai rail corridors to raise train speed to 200 km per hour.
“We have earmarked Rs 20,000 crore to strengthen infrastructure and upgrade the signalling system on these two routes in the next 3-4 years,” Prabhu said.

 

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“कश्मीर-समस्या”- समाधान की ओर एक कदम।

कश्मीर समस्या अब हमारे सामने उस विकराल रूप में नहीं रहा जिस रूप में वह 2014 तक था।
यह अब न अंतर-राष्ट्रीय मुद्दा रहा, न भारत-पाकितान के बीच का द्विपक्षीय मुद्दा। यह अब भारत का आंतरिक मामला मात्र रह गया हैं। विश्व समुदाय के लिये अब पीओके, गिलगिट, बलूचिस्तान व उसके साथ पाक-प्रायोजित आतंकवाद समस्या है। पाकिस्तान की स्थिति बहुत कमजोर हुई हैं। यहाँ तक उसे मुस्लिम राष्ट्रों से भी समर्थन नहीं मिल रहा हैं। चीन का अपना आर्थिक व सामरिक स्वार्थ है पाकिस्तान को समर्थन देने का। भारत-पाक के बीच अब केवल आतंकवाद एक मात्र मुद्दा है। यह पिछले 3 वर्षों में मोदी सरकार द्वारा किये गए अथक प्रयास के सफलता का प्रतिफल है। इसे हम शुद्ध रूप से कूटनीति सफलता कह सकते हैं मोदी सरकार की।
कश्मीर में मुख्य समस्या कानून व्यवस्था की व राजनीती रह गई हैं, जिसके आड़ में पाकिस्तान अपनी बेइज्जती की खीज निकालने के लिये आतंकवादियों को भेज कर हमें परेशान करता रहता हैं।
यह संभव हो पा रहा हैं संसद, न्यायपालिका, कार्यपालिका, मिडिया में बैठे “आस्तीन के साँपो” के द्वारा इनको दिए जा रहे खुले समर्थन के कारण।
खैर, इन सब का अंत तो सीधे तरीके से सरकार नहीं कर सकती हैं, “यह काम तो जनता को ही करना पड़ेगा”, लेकिन इनके द्वारा पोषित पत्थरबाज, अलगाववादी व आतंकवादियों का अंत सरकार के द्वारा किया जाना चाहिये। कुछ सुझाव आप सबके विचारार्थ:-
रामायण से हमने जाना है कि “दुश्मन पर विजय पाना हो तो स्थानिये समर्थन जरूरी हैं” और दूसरी बात “बिना भय के प्रित नहीं होती”।
स्थानिये लोग वहाँ के आतताइयों के खिलाफ किसी के साथ तब ही खड़े होते है, जब उन्हें उन आतताइयों से सुरक्षा का पूर्ण भरोसा दिया जाय। वर्ना स्थानिये लोग मजबूरी में उन आतताइयों के साथ खड़े रहेंगे भय के कारण। दूसरी बात दुश्मन तब कमजोर पड़ता हैं जब वह आप से भयभीत होता हैं।
अब कश्मीर के संदर्भ में देखे तो सेना, सुरक्षाबल व सरकार चाहे कुछ भी किये हो, खूब ईमानदारी से किये हो लेकिन वे अब तक सबसे जरूरी ये दोनों बातें नहीं कर पाये हैं –
1. स्थानिये लोगों को सुरक्षा देना और 2. आतंकियों में भय व्याप्त कराना। और इसी कारण अब तक कश्मीर की समस्या खत्म नहीं हो पाई हैं। आप यह मत कहिये कि आपने इतने आतंकी मार गिराये। वो मरने के लिए ही आते है और हर बार आपको बुरी तरह हरा कर मर जाते हैं। वो अपना उद्देश्य पूरी सफलता से हासिल कर लेते हैं, आप उसे मार कर बिना मतलब के खुस हो जाते हैं। वो जब चाहे, जहाँ चाहे घुस जाते हैं, स्कूल में आग लगा देते हैं, बैंक लूट लेते हैं, हथियार छीन लेते हैं, पोलिंग बूथ तक लूट लेते हैं, अपना वीडियो बनाते हैं, दुनिया को दिखाते है और आप केवल पेट्रोलिंग करते रह जाते हैं।
आप यह भी मत कहिये कि बाढ़ व प्राकृतिक विपदाओं के समय आपने उनकी मदद की। ये सही है, कश्मीरी आपका एहसान मानते हैं, वो आपकी मदद करना भी चाहते हैं, अनेको ने आपकी मदद करने की हिम्मत भी दिखाई, लेकिन उन्हें आप आतंकियों से बचा नहीं सके , वो आतताइयों के द्वारा मौत के घाट उतार दिए गए। फिर कौन हिम्मत दिखाये, किस भरोसे हिम्मत दिखाये आपकी मदद करने की? आप उन्हें सुरक्षा की गारंटी दीजिये, उन्हें उस सुरक्षा का एहसास कराइये, कश्मीर की 95% जनता आपके साथ होगी। फिर 5% अलगाववादियों को वो खुद मार देगी आपको कुछ करना ही नहीं पड़ेगा।
चलिये माना कि 70 वर्षो में सरकारे आपके साथ नहीं थी, आपको खुली छूट नहीं थी, लेकिन पिछले 3 वर्षों में ये शिकायत भी आपकी नहीं रही। फिर 3 वर्ष और हम उसी जगह खड़े है! क्यों? कभी सोचा है आपने? इसका मूल कारण है कि आप केवल प्रतिक्रियावादी बन कर कार्य कर रहे हैं। जब कोई घटना आपके खिलाफ होती हैं, तब आप प्रतिक्रिया स्वरूप कारवाही करते हैं। फिर अगली घटना का इंतजार करते हुए दैनिक कार्यो में व्यस्त हो जाते हैं। और यही सबसे बड़ी चूक हो जाती हैं, दुश्मन को तैयारी का मौका मिल जाता हैं। आपकी नीति होनी चाहिये “ढूढो और मारो”। उन्हें वीडियो मत बनाने दे, उन्हें चैन से न बैठने दे, उन्हें ऐसी सजा दे कि उनकी रूहे कॉप जाय, वे भारत की सीमा के अंदर आने से कतराए। आपको किसे बताना है क्यों बताना है कि कितने मारे और कैसे मारे? उसका वीडियो न बनाये, प्रमाण न छोड़े, लेकिन भारत-पाकिस्तान में बैठे उनके आकाओं में भी भय व्याप्त हो ऐसा कुछ करे। आप जानते हैं आपको क्या करना है, कैसे करना है? बहुत जंगल है कश्मीर में। लेकिन जो भी करे वो लगातार करे, टुकड़ो में नहीं, सतत् प्रयास से ही सफलता मिलती हैं।उनके अंदर आपका डर ऐसा हो कि वो जहन्नुम जाना पसंद करें लेकिन हिंदुस्तान की सीमा के अंदर आना नहीं।
इसके लिए आप इन बातों पर ध्यान दे सकते हैं:-
1. आतंक पीड़ित क्षेत्र में इंटरनेट व्यवस्था अनिश्चित काल के लिये पूरी तरह बंद कर दे। मैं इसकी मांग की थी ट्विटर पर, सुनने में आया है कि केवल 3G व 4G सेवा बंद हुई हैं। यह गलत हैं। पूर्ण बंदी हो।
2. “सेना बैरक में अच्छी नहीं लगती”। कश्मीर में संख्या बढ़ाये सेना व सुरक्षाबल की।
3. हर पुलिस चौकी में सेना के जवान भी तैनात रहे। हर सरकारी संसथान के सुरक्षा में पुलिस के साथ सेना-सुरक्षाबल तैनात रहे।
4. हर मोहल्ले व गली में पुलिस-सेना-सुरक्षाबल की चौकी हो।
5. हर देशभक्त नेता, पुलिस, कर्मचारी, स्थानिये लोगो को पर्याप्त सुरक्षा दीजिये। कमांडो सुरक्षा दीजिये। उनके अंदर के भय को मिटा कर उन्हें सुरक्षा का एहसास कराइये।
याद रहे “कश्मीरियों को विकास से अधिक सुरक्षा की जरूरत हैं”।
6. पेट्रोलिंग टीम बढाइये, हर टीम में अपनी संख्या बढाइये। जहाँ 2 की जरूरत है वहाँ 6 भेजिये।
7. ढूढो और मारो की नीति पर चलिये।
8. क्यों नहीं सरकार मरने के बाद 50 लाख देने के बदले वो न मर पाये इसका इंतजाम करे।
9. जो अलगाववादी नेता है, जिनका भारत के संविधान में भरोसा नहीं, जो कश्मीर को भारत का अंग नहीं मानते उनकी “नागरिकता ख़त्म करे”। उनकी व उनके परिवार की सुरक्षा व तमाम सरकारी सुविधा ख़त्म करे। उसे जेल में डाले। उसके सम्पति जब्त करें। आम जनता में उनके झूठ का भंडाफोड़ करें।
10. “आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता”। अतः आतंकी की मौत के बाद उसे सुवर के मांस के साथ जलाने की राष्ट्रीय नीति बनाये।
11. पैलेट गन के इस्तेमाल की पूरी छूट मिले सेना व सुरक्षाबल को।
12. उपद्रवियों को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार करें और उसे कश्मीर से बाहर के जेल में रखें। इसकी पूर्व घोषणा पुरे क्षेत्र में करा दे।
13. सरकार मिडिया के लोगो को बुला कर उनसे बात करें और इस मामले में उनका सहयोग लें। अलगावादियों, आतंकियों, उनके समर्थकों को मीडिया कवरेज से पूर्ण रूप से दूर रखें। उनके इंटरव्यू आदि न दिखाये। सेना व सुरक्षा बल के कारवाही को गुप्त रखें, उतनाही खबर दिखाये जितना सेना द्वारा बताया जाए। इसके बदले भारतीय मीडिया का सारा फोकस पीओके, बलूचिस्तान व गिलगिट पर होनी चाहिये। वहाँ की खबरें “डेली रिपोर्टिंग” का हिस्सा बने प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का। इसमें सरकार उनका सहयोग करें।
14. हर स्तर के इंटेलिजेंस को दुरुस्त करें।
मेरी एक बात याद रखिये कि “आधे मन से जंग नहीं जीती जाती”।
“दौड़ कछुआ ही जीतता है खरगोश नहीं”। सतत् प्रयास पूरी ताकत से कीजिये। सफलता बहुत जल्द मिलेगी।
यह भी सत्य है कि जैसे ही सरकार ये कारवाही करेगी आतंकियों के हिंदुस्तानी एजेंट दहाड़े मार कर रोने लगेंगे। लेकिन मोदी जी आपको वोट देशभक्त जनता ने दिया है, इन आतंकियों के रिस्तेदारो ने नहीं। ये संसद के अंदर चिल्लाये या बाहर आप इनकी परवाह मत कीजियेगा। देश की जनता इनका ईलाज कर देगी। आप तो सेना व सुरक्षा बल के साथ मिल कर पुरे मन से कश्मीर को आतंक व भय से मुक्त कर इसे फिर से “धरती का स्वर्ग”बनाइये। कल्हण की आत्मा आपको आवाज दे रही हैं। डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी जी का बलिदान व्यर्थ न जाने पाय।
वंदे मातरम। भारत माता की जय।
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Bebasi

#केहरसिंह_फ़ौजी_बनाम_जज_साहब

वो बिना हेलमेट के बाइक चला रहा था। पुलिस वाले ने रोका, कहा “हेलमेट कहाँ है?” उसने बोला भूल गया।

पुलिस वाला: क्या नाम है? काम क्या करते हो?
बाइक सवार: केहर सिंह नाम है और मैं एक फौजी हूँ।
पुलिस वाला: अच्छा कोई बात नहीं जाओ, आगे से हेलमेट पहन कर बाइक चलाना।
फ़ौजी: नहीं भाई, आप अपना काम करो। मैंने गलती की है मेरा चालान काटो।
पुलिस वाला: ठीक है, अगर ऐसी ही बात है तो निकालो 100 रु और पर्ची लेकर जाओ।
फ़ौजी: नहीं, यहाँ नहीं भुगतना चालान। मैं अदालत में ही जाकर चालान भुगतुंगा।

#अदालत

संतरी: केहर सिंह को बुलाओ।
जज: हांजी, मिस्टर केहर सिंह आप 100 रु का चालान भर दीजिये।
केहर: नहीं जनाब, यह कोई तरीका नहीं हुआ। आपने मेरी दलील तो सुनी ही नहीं।
जज: अच्छा बताओ क्यों तुम्हें 100 रु का फाइन न किया जाए?
केहर: जनाब, 100 रु का फाइन थोड़ा कम है इसे आप 335 रु का कर दीजिए।
जज: क्यों? और 335 का ही क्यों?
केहर: क्योंकि मुझे 100 रु कम लगता है और 336 रु ज्यादा ही नाइन्साफ़ी जो जाएगी।

(वहाँ खड़ी भीड़ हंसती है)

जज: (काठ का हथौड़ा मेज पर मारते हुए) शांति, शांति बनाए रखिये।
केहर: जनाब एक और सलाह है, ये हथौड़ा काठ की बजाए स्टील का होना चाहिए आवाज ज्यादा होगी। एक और बात, यहाँ इस कमरे में भीड़ बहुत ज्यादा है। आप एक आर्डर पास कर दीजिए की कल से यहाँ ज्यादा से ज्यादा बस 127 लोग ही आएं।
जज: are you lost your mind Mr. Kehar Singh? आप यहाँ अदालत में जोक्स क्रैक कर रहे हैं। आप एक जज को सिखा रहे हैं कि अदालत कैसे चलानी है? कानून क्या होना चाहिए? फैसला क्या करना है? आपको पता भी है हम किस परिस्थिति में काम करते हैं? हमारे ऊपर कितना प्रेशर होता है? और….

केहर: जनाब! मैं एक फौजी हूँ। अभी कश्मीर में पोस्टेड हूँ। with all due respect sir आपको घण्टा नहीं पता कि प्रेशर क्या होता है। आपका प्रेशर ज्यादा से ज्यादा आपको एक दो घंटे ओवरटाइम करवा देगा। हमारा प्रेशर हमारी और सैंकड़ो और लोगों की जान ले सकता है।

जनाब, क्षमा कीजिये कि मैंने आपको सलाह दी। जिस काम के लिए आपको ट्रेनिंग दी जाती है, जिस काम में आप माहिर हैं उस काम में मैंने आपको सलाह दी। परन्तु आप भी तो यही करते हैं हमारे साथ…..मसलन…बन्दुक को 90 डिग्री से नीचे कर के चलाओ, असली गन मत चलाओ, पेलेट गन चलाओ, बस घुटनों के नीचे निशाना लगाओ, प्लास्टिक की गौलियाँ इस्तेमाल करो, प्लास्टिक की गोली भी खोखली होनी चाहिए, उसका वजन xyz ग्राम से ज्यादा नो हो। ये क्या बकचोदी है जज साब? क्या आप यहाँ ac रूम में बैठ कर हमें सिखाओगे कि हमें अपना काम कैसे करना है? जिस काम के लिए हम trained हैं, जिन situations का हमको firsthand experience है आप हमें बताओगे कि उस situation में हमें कैसे react करना चाहिए?

(सन्नाटा)……

 

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